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Monday, March 11, 2013

पाप का बंधन ...... कब और क्यों

महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन शस्त्र त्याग कर बैठ जाते है और भगवान श्रीकृष्ण से कहते है कि मैं अपने ही  बंधुओ और गुरुजनों कि हत्या कर के राज्य हासिल कर भी लू तो भी तो पाप का भागी ही रहूँगा...... तब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते है .......

युद्ध में सबसे पहले जय - पराजय होती है , जय - पराजय का परिणाम होता है लाभ और हानि तथा लाभ और हानि का परिणाम होता है - सुख और दुःख | जय - पराजय में और लाभ और हानि में सुखी दुखी होना तेरा उद्देश्य नहीं है | तेरा उद्देश्य तो तीनो में सम होकर अपने कर्तव्य का पालन करना है ( समता का ही गीता में महत्व है समता अर्थात किसी भी परिस्थति में समान रहना )......
अतः तू पहले यह विचार कर ले कि मुझे तो केवल अपने कर्तव्य का पालन करना है (अर्थात एक छत्रिय का कर्तव्य है युद्ध करना ) , जय - पराजय आदि से कुछ मतलब नहीं रखना है , फिर युद्ध करने से पाप नहीं लगेगा अर्थात ससार का बंधन नहीं होगा.......

नैव पापम्वाप्स्यसी  - (२:३८) गीता

हे अर्जुन , समता में स्थित होकर युद्ध रूपी कर्तव्य कर्म करने से तुझे पाप और पुण्य - दोनों ही नहीं बांधेंगे |

Thursday, February 28, 2013

कामना का चक्र और दुःख .....


कामना को पूरा होने को मनुष्य ने सुख मान लिया है जो की वाकई सुख है ही नहीं ...... मनुष्य इस भ्रम में है कि कामना पूरी होने से सुख होता है जबकि कामना सिर्फ और सिर्फ बढने के लिए ही पैदा होती है न कि सुख देने के लिए ....... मनुष्य सांसारिक बस्तुओ कि कामना करता है और कामना करने के बाद जब बह बस्तु प्राप्त होती है तब मन में स्थित कामना निकलने के बाद ( दूसरी कामना पैदा होने से पहले ) उसकी अबस्था निष्काम कि होती है और उसी निष्कामता का उसे सुख होता है निष्कामता अर्थात किसी भी कामना का न होना......
परन्तु उस सुख को मनुष्य भूल से सांसारिक बस्तु कि प्राप्ति से उत्पन्न हुआ मान लेता है जो कि सर्बथा है ही नहीं ..... अगर बस्तु कि प्राप्ति से सुख होता , तो उसके मिलने के बाद उस बस्तु के रहते हुए सदा सुख रहता | दुःख कभी होता ही नहीं और पुनः बस्तु कि कामना उत्पन न होती |
इसलिए सुख तो केबल कामना रहित होने का है जिसे मनुष्य ने भूल से सांसारिक बस्तु कि प्राप्ति से मान रखा है ..... और यही दुःख का कारण है ......

Wednesday, February 27, 2013

दुःख और सुख ...... कारण ?

संसार मात्र में दो चीजे है जो दुःख और सुख को निर्धारित करती है  करना और होना...... करना अर्थात कर्म और होना अर्थात उसका परिणाम ...... इसलिए गीता में कहा गया है करने में साबधान और होने में प्रसन रहो........ करने में साबधान नहीं रहते और होने में शोक करते हो ......... यही दुखो का कारण है जो करने में 
साबधान और होने में प्रसन्न रहता है वही साधक है ......

 इस के अतिरिक्त चाहत अर्थात कामना दुखो का कारण बनती है ........ जो चाहते है वो न मिले और जो नहीं चाहते है वो मिल जाये तो दुःख होता है अगर इन सब में से चाहत निकाल दी जाये तो दुःख है ही कहाँ ...... अर्थात कामना भी दुःख का कारण है ...... 

Tuesday, February 26, 2013

सुख और दुःख ..... आखिर क्यों ...

मनुष्य के सामने जन्मना मरना लाभ , हानि आदि के रूप में जो परिस्थति आती है बह प्रारब्ध का अर्थात आपने किये हुए कर्मो का फल है उस अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों को लेकर शोक करना सुखी दुखी होना केवल मूर्खता ही है | कारण की परिस्थति चाहे अनुकूल आये या प्रतिकूल आये उसका आरम्भ और अंत होता है अर्थात बह परिस्थति पहले भी नहीं थी और अंत में भी नहीं रहेगी जो परिस्थति आदि और अंत में नहीं होती बह बीच में एक पल भी स्थायी नहीं होती अगर स्थ्याई होती तो मिटती कैसे ? और मिटती है तो स्थायी कैसे ? ऐसी प्रतिपल मिटने वाली अनुकूल प्रतिकूल परिस्थति को लेकर शोक करना , हर्ष करना , सुखी दुखी होना केवल मूर्खता ही तो है .......

Thursday, May 24, 2012

True V/s Falls: no need to worry

संसार मात्र में दो चीजे है  सत् और असत् , शरीरी ( आत्मा ) और शरीर | इन दोनों में शरीरी तो अविनाशी है और शरीर विनाशी है ये दोनों ही अशोच्य ( चिंता न करने योग्य ) है अविनाशी का कभी विनाश नहीं होता और विनाशी का विनाश होता ही है अर्थात जो पैदा हुआ है उसका विनाश निश्चित है | इस लिए अविनाशी के लिए चिंता करने का कारण बनता ही नहीं और विनाशी एक पल के लिए भी स्थायी रूप से नहीं रहता इसलिए उसके लिए भी शोक करना या चिंता करने का कारण नहीं बनता | 

तात्पर्य हुआ की शोक करना अर्थात चिंता करना  न तो शरीरी के लिए  बन सकता है न ही शरीर के लिए बन सकता है शोक के होने में तो केवल अविवेक ( मूर्खता ) ही  कारण है |

this phrase declare only one meaning: there is no need to worry. God is every where and the objects are doing there duties very well on its places. 
we ll find same what we gave 

जिंदगी  एक गूँज की तरह है हमे वही वापस मिलता है जो हम देते है|


Tuesday, August 17, 2010

MY THOUGHTS

No one is perfect. God put some lack in everyone’s life and perhaps it is essential to live this life truly.
According bhagvad deeds is responsible for all that. We don’t know how and where this phenomena work but this is true. Somewhere out of our vision this logical system is running. Where the administrator is god. This system has its own program to run this universe without any error. This program has very simple language but yet most of us don’t want to understand this.Only faith is the factor that can make us understand this program................ we made a computer and think that we are genius but dont know that GOD running a great system ...... we ll discuss this in next

thanks